एहसास
आज पुनः आम्या और सौर्य स्कूल नहीं आए | सत्र की पहली पीटीएम में भी अनुपस्थित थे | उनके घर से कोई भी नहीं आया ये जानने को कि बच्चे पढ़ाई में कैसे हैं, उनका कौशल स्तर कैसा है ? अब या तो मैं उनके माता-पिता को फोन लगाऊँ या फिर अपनी इंचार्ज को रिपोर्ट करूँ | क्या करूँ ? क्या करूँ ? कुछ समझ नहीं आ रहा ? हैरान हूँ कि आजकल के बच्चे और उनके माता-पिता सब बदल गए हैं | सबके सब ऑनलाइन ज़िंदगी में खुश हैं | मैं तो सोचती हूँ अध्यापकों की कोई कद्र ही नहीं करता | अथक परिश्रम के बाद भी क्या हांसिल होता है थोड़ी सी इज्ज़त, वो भी कहाँ ? हुअं | क्या होगा समाज का, देश का | सर फट रहा है ज़ोर से | पर मुझे दोनों की बहुत चिंता हो रही है !!
(दूसरी अध्यापिका का कक्षा में प्रवेश) अरे किरण !तुम इतनी परेशान क्यों हो ? क्या हुआ कोई टेढ़ा पेरेंट आ गया क्या पीटीएम में | मेरे तो सारे पैरेंट्स आकर भी चले गए | बहुत देर से तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रही थी | चलो जल्दी अब बहुत भूख लगी है, खाना खाते हैं | अरे ! उठो भी, इतना परेशान मत हो यहाँ तो ये सब लगा ही रहता है | मैं अनमनी सी सारा सामान अलमारी में रखकर दिशा के साथ स्टाफ रूम की ओर चल दी | बार-बार एक ही सवाल मुझे परेशान कर रहा था,स्कूल का समय खत्म हुआ घर के कामों की व्यस्तता के पश्चात बिस्तर पर लेटते ही कुछ कौंध रहा था बिजली का सा |मैं एकदम रात को उठकर बैठ गई | कल मैं सबसे पहले सौर्य के पैरेंट्स को फोन करूँगी नहीं तो मुझे चैन नहीं आएगा | इसी कशमकश में रात कब बीती मुझे पता ही नहीं चला |
फिर उसी तूफानी भागदौड़ के साथ मैं जोश में बढ़ चलीऔर तुरंत रिशेप्सन पर पहुँचकर मैंने आम्या और सौर्य के माता-पिता को फोन मिला दिया | काफ़ी देर तक घंटी बजने के बाद किसी ने फोन उठाया कहा कि कल उनके पिताजी स्कूल आएंगे और आपसे बात करेंगे | अभी कुछ और मैं कहती उससे पहले ही फोन कट गया | मैं स्तब्ध सी अपनी कक्षा की ओर बढ़ चली और अपने रोज़ के कामों में व्यस्त हो गई | जिन अध्यापिकाओं ने आम्या और सौर्य को पहले पढ़ाया था उनसे भी मैंने बातचीत की तो पता चला कि वे पहले कभी अनुपस्थित नहीं होते थे और जैसा उन्होने बताया कि आम्या थोड़ा चंचल स्वभाव कि है और सौर्य थोड़ा समझदार |
मैंने पिछली जानकारी को सुनकर सोचा कि आम्या और सौर्य तो कक्षा में ज़्यादा अनुपस्थित रहते हैं | मुझे बड़ी हैरानी हुई ये सोचकर ! इस प्रकार कल उनके पिताजी से बात करने के लिए पूरी भूमिका मैंने तैयार करली | मुझे आज सुखद महसूस हो रहा था कि कल मेरी कक्षा के दोनों बच्चों के अनुपस्थित रहने और पीटीएम में न आने का कारण मुझे पता लगेगा | मैं निश्चिंत होकर सोई | सुबह जब स्कूल आई तो उनके पिताजी रिशेप्सन पर बैठे थे | उन्हें ५ से १० मिनट के बाद ऊपर मेरी कक्षा में भेजा गया | बड़ी बेसब्री से मैं भी उनका इंतज़ार कर रही थी |
नमस्कार के बाद बात शुरू ही करती कि उससे पहले ही उनकी आँखें भर आईं | अचानक उन्हें इस स्थिति में देख मैंने कुर्सी आगे की उन्हें बैठाया पानी मंगवाया | कुछ क्षण बाद जैसे ही बोलने को हुई एकदम से उनके मुँह से निकला कि इन बच्चों की माँ नहीं रहीं | मैं जानता हूँ आपके मन में कई सवाल हैं, बच्चों के कार्य और व्यवहार को लेकर | जून के महीने में ही उनका स्वर्गवास हुआ, तभी किसी को भी स्कूल में इस बारे में जानकारी नहीं थी | अभी थोड़ा संभल रहे हैं, कई बार मेड नहीं आती तो उनका टिफिन तैयार करने में मुझे वक़्त लग जाता है | इसी वजह से कई बार वह स्कूल भी नहीं आ पाते |
यह सब सुनकर मेरे पैरों के नीचे से मानो ज़मीन निकल गई |आँखों के आगे अंधेरा सा छा गया, मैं हतप्रभ सी एकटक सब सुनती रही मानो मस्तिष्क में बर्फ जम गई हो | वह जैसे ही कुर्सी से उठ खड़े हुए तो मेरी आँखें ऐसे छलछलाईं मानो गहरे समुंदर के भीतर आए तूफ़ान ने छोटा रूप ले लिया और बह चला अपने वेग को संभाल |
माँ को खोने के एहसास मात्र से ही रूह कांप रही थी | आँखों में दोनों का खिलखिलाता मासूम सा चेहरा,एक लंबी उदासी और एक दृण संकल्प की भावना थी | मैंने खुद को संभाला और एक गहरी आश्वासन भरी सांस से खा आपके दोनों बच्चे बहुत प्यारे हैं, अच्छा करते हैं और भी अच्छा करेंगे खुद पर और ऊपरवाले पर यकीन रखिए | उनको मैंने ढांढस तो बंधाई हर वक़्त मैं उन बच्चों के बहुत करीब हूँ किन्तु ये एहसास जीवन भर के लिए मुझे बहुत कुछ सिखा गया |
भावना ‘मिलन’