शनिवार, 12 जून 2021

https://www.womenexpress.in/editorial-blog/change-yourself-from-your-adversity-on-environment-day/

 आलेख

मनुष्य की अनंत इच्छाओं के कारण प्रकृति अभी भी नाराज़ है –

शहरीकरण, लोलुपता, अंधाधुंध भागती सोच के परिणाम स्वरूप आज मनुष्य जाति कहाँ आ खड़ी है ये तो हमारे सामने ही है | हमने कभी न सोचा था कि ईश्वर ने हमारे लिए ये दंड सोच रखा था हमारी गलतियों की अति का | कहर बरसाया है महामारी ने, साँसों की डोर टूटीं असंख्य | वीभत्स दृश्य आँखों में, हृदय में ऐसे समाया कि अब भी नहीं निकल पा रहा इससे इंसान |

दुआएँ मांग रहा है दिन-रात अपनी जान बचाने के लिए | तब क्या हुआ था जब ऊँची इमारतें, टावर,काला धुआँ छोड़ती फेक्ट्रियाँ, नदियों-नालों में प्लास्टिक का जमाव करने में खो गया था !!

तरक्की में मानवता का पाठ ही भुला दिया था |बस दौड़ता ही चला गया आगे निकलने की रेस में !! न रुका न थका, हर कोई बड़ी मछली बनने की होड़ में और छोटी मछली को साम-दाम,दंड-भेद निगल अपनी पीठ थपथपाने में तल्लीन |

प्रकृति का सुंदर स्वरूप छिन्न-भिन्न कर दिया विकास और व्यवस्था के साथ जो खो रहा है,उसमें तालमेल न बैठा सका | सिमट गए सब एक संकुचित दुनिया में, खुली हवा में सुकून से सांस लेने का मज़ा खुद भी भूल गए और अपनी आगे वाली पीढ़ी को भी न सिखा सके | अब जब ऐसा खौफनाक मंज़र आया तो याद आ गए प्रभु भी और याद आ गए सब किए हुए कारनामें घर बैठ |देख लिया अब तो कि तुम्हारे भागते पैरों की लगाम कोई और खींच सकता है | उठाकर कैसा पटका ज़मीन पर कि कोई हाथ भी न बढ़ाएगा उठाने को, कोई पास भी न आएगा अपना दफनाने, जलाने को !! सोचा था कभी कि अंतिम दर्शन में अपने प्यारों को भी न देख सकोगे , नहीं न |


अपने कर्मों को सोच पाए बस अकेले,रो पाए तो अकेले, कह पाए बस उससे जिसे भूल ही गए थे |मानवता खतरे में पड़ी हमारी ही गलतियों से,दुआओं में नित हाथ उठ रहे हैं अब एक बार तो सभी के मन में रोज़ ईश्वर का नाम सिमर आता है अब  और अपनी गलतियाँ भी |

महामारी सर पर तांडव कर रही फिर भी अमानवीय व्यवहार की पराकाष्ठा तो देखो कालाबाजारी करने पर अभी भी कई लोग आमादा रहे | इंसान- इंसान को ही खाने लगा अपने स्वार्थ में धंस गया |

देख लो प्रकृति की आपदाओं को क्रोध बरसा रही है | चक्रवात, तूफान, बवंडर से  कितना नुकसान मानवजाति को हुआ और होगा, संभल जाओ,इंसानियत अपना लो बस यही काफी है ! यदि अब भी अपने मैले मन साफ न किए, प्रकृति और उसकी बनाई हर एक चीज़ के प्रति प्रेम भाव न मन में जगाया तो दृश्य तो आपके सामने ही है |प्रकृति की रक्षा उसके हर एक प्राणी के प्रति सद्भाव से है | चाहे वे पेड़-पौधे हों, पशु-पक्षी हों,या फिर कोई लाचार मनुष्य |


इस पर्यावरण दिवस पर अपनी विपरीत परिस्थितियों से खुद में बदलाव लाओ सादगी की तरफ कदम बढ़ाओ, सेवा की तरफ कदम बढ़ाओ अपने बच्चों की प्रकृति में बदलाव लाओ, ताकि वो अपने आसपास की प्रकृति में बिखरी हर चीज़ को संवार सकें अपने बुद्धि और कौशल से |प्रकृति को बचाने का उसके क्रोध को शांत करने का इससे अच्छा और कोई उपाय नहीं हो सकता  |

भावना अरोड़ा 'मिलन'




विषय ------ पर्यावरण सुरक्षा विधा- ( लघुकथा - संतान )

  विधा- ( लघुकथा - संतान )

अरे पुतवा ! तू अभी तक यहीं खाट पर बैठा है ।

 गाँव की सारी पंचायत,छोटे-बड़े  सभी पौध लगाने के लिए जमा हो गए हैं । ‘सब तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं चल-चल जल्दी उठ ।’

‘सरपंच जी ने मुझे भेजा है तुझे बुलाने को।’ - मक्खन दादा ने कहा ।

पुतवा कुछ देर ख़ामोश रहा मानो डूबते सूरज-सी उदासी उसके अंतर में समा गई हो ।

‘मैं क्या करूँगा आकर ! आपको तो पता है न कि मेरा जवान बेटा नहीं रहा । शहर बस गया था हमारे लिए चार पैसे कमाने को, पर अकेला था, उसे वक्त पर सही इलाज न मिल सका ! लोग कालाबाज़ारी करते रहे और बिना आक्सीजन सिलेंडर के ही।

मुझे नहीं लगाना कोई पौध-वौध मेरा तो संसार ही उजड़ गया.......(पुतवा का गला रुंध गया वह आगे कुछ न कह सका ) 

‘देख पुतवा,हम तेरा दर्द समझते हैं । हम तेरा बेटा तो वापिस नहीं का सकते, पर क्या तू चाहेगा कि महामारी ने जिन बेक़सूर मासूमों को को दुष्ट लोगों के कुकर्मों की वजह से लपेट लिया है । वो कहावत हैं न -‘आटे के साथ घुन भी पिस जाता है ।’ हम एक पौध लगाकर अपने पर्यावरण की रक्षा करेंगे तो प्रकृति का क्रोध कम कर सकेंगे, शायद ये महामारी सिमट जाए ।

 अच्छी कोशिशें कभी ज़ाया नहीं होतीं ।  अगर तू अपने बेटे के नाम से एक पौध लगाएगा तो ये समझना कि तूने कितनों को जीवन दिया है । 

यही सच्ची श्रद्धानजलि  होगी तेरी अपने बेटे को ।’ मक्खन दादा ने पुतवा काँधे पर हाथ रखकर कहा ।

पुतवा- ‘ हाँ ! दादा ( गंभीर सोच के साथ उठता है । ) 

वो एक पौध नहीं मेरी वो संतान होगा  जो सभी को साँसें देगा बिना भेदभाव के। 

चलो चलता हूँ ।’

भावना अरोड़ा ‘मिलन’

कालकाजी,नई दिल्ली

शुक्रवार, 11 जून 2021

सोशल मीडिया,नेवर्किंग साइट : यौन संबंध और मैली गंगा !

 आलेख: सोशल मीडिया,नेवर्किंग साइट : यौन संबंध और मैली गंगा !

आप ये हेडिंग पढ़कर चौंकिए मत ! कहीं ये आपके मन की ही बात तो नहीं उजागर कर रही | घबराइए मत 

आजकल सोशल मीडिया का नेटवर्क जितनी तेज़ी से अपनी बात कुछ ही सेकेंडों में विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंचा रहा है, यह जितना हमारे समय को बचाकर तीव्र प्रणाली से काम करने में सक्षम है उतनी ही तेज़ी से यह हमारे जीवन को अपने वश में भी कर रहा है |

नज़रिया हर किसी का अलग है, अलग-अलग सोच है | हाड़-मांस में सब एक जैसी ही रचना हैं उस परमपिता की किन्तु फर्क है तो बस दृष्टिकोण का | कुछ नया नहीं है विषय इस पर हर ओर चर्चाएँ हो रही हैं, शोध हो रहे हैं |

 मनुष्य की सोच को यंत्राधीन होने से कैसे रोका जाए यह विषय बहुत गंभीर हो चुका है | सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं में से अब नकारात्मक अपने साथी पर हावी हो रहा है | यही तो रोकना है पर कैसे ?

पेंडमिक के इस दौर ने सभी को इनसे इतना जोड़ दिया है कि काम के साथ-साथ न जाने कितनी पॉर्न साइट्स पर नाबालिग बच्चे,बड़े,बूढ़े,शादीशुदा सभी मनोरंजन कर रहे हैं |

        एक ज़माना था बच्चों की सोच-विचार में घर-परिवार के संस्कार चमकते थे अब तो घर में बजती पूजा की घंटी नहीं सुनाई देती उन्हे पर मोबाइल में एसएमएस की आवाज़ से तुरंत उनके कान खड़े हो जाते हैं  |

 

सबसे ज़्यादा युवा पीढ़ी आज इसकी चपेट में है, साम-दाम, दंड-भेद हर उपचार करके वह बस इनके बिना जीना नहीं चाहती |  क्या करें भैया ! सभी काम #ऑनलाइन जिंदगी हो गए हैं | युवाओं को ही निर्णय लेना है कि इसका प्रयोग कितना सही और गलत है | 

आज हमारी यही पीढ़ी या तो सबसे ज़्यादा इसका फ़ायदा उठा रही है या बर्बाद हो रही है | ये एक कड़वी हकीकत है फ़िज़िकल अट्रेक्शन, जिसमें युवाओं की सबसे ज़्यादा रुचि  है |

        वो है - विपरीत लिंग की प्रोफ़ाइल से आकर्षित होना, शारीरिक खिंचाव महसूस करना, उनके बारे में अश्लील सोच रखकर पॉर्न वीडियोज़ देखना और शीघ्र अतिशीघ्र सेक्स या कह लीजिये शारीरिक संबंध बनाने के लिए आतुर रहना |

एक बेचैनी सी बनी रहना | बार-बार अनजान और खूबसूरत प्रोफ़ाइल को भेजी गई रेकवेस्ट की स्वीकृति के लिए बेसब्री रहना | न जाने कितने ही लोग ऐसे हैं जो म्यूचुअल फ्रेंड होने का फ़ायदा उठा रहे हैं | बस विश्वास सधा रहता है मन में कि किसी जानकार से बात की, कुछ हुआ तो दिक्कत नहीं आएगी |

     मैं ये नहीं कहती कि सिर्फ पुरुष ऐसा करते हैं, आजकल कई स्त्रियाँ भी इन सबमें शामिल होती हैं |

बहुत अच्छा और सरल उदाहरण देती हूँ, छोटे-छोटे शहरों और गांवों से माता-पिता बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए बाहर महानगरों में भेजते हैं, पर क्या वे सभी यहाँ माता-पिता की दी हुई आज़ादी का सही इस्तेमाल करते हैं ? क्या वे उनकी इज्ज़त, मान-सम्मान को बरकरार रखते हैं ? पढ़ाई के लिए भेजे गए पैसों का सही उपयोग करते हैं ? मैं ये नहीं कहती कि सभी युवा ऐसे हैं पर आंकड़े देखे जाएँ तो ८० % बच्चे अपने संस्कारों को शहर की ओर बढ़ती हुई बस और ट्रेन में बैठते ही भूल जाते हैं |

    शुरू कर देते हैं बस अपने वक़्त और मेहनत के पैसे की बरबादी- चरस, सिगरेट के धुएँ, होटल के महंगे खाने, क्लब, महंगे कपड़ों, और नाइट पार्टियों में | लिखते हुए उँगलियाँ थरथरा जाती हैं कि अपनी और अपने माता-पिता की इज्ज़त को होटल के बंद कमरे में नाजायज शारीरिक सम्बन्धों के नशे में भुला देते हैं !

सारी मर्यादाओं को तोड़ देते हैं यौन संबंध की खातिर ?

बड़ी मासूमियत से अपने माता-पिता से पैसे मँगवाते हैं कभी बीमारी तो कभी किसी और बहाने से | हमारी धरा पर बहती गंगा तो मनुष्य के पापों और प्रदूषण के कारण मैली है पर उसकी ममता का आँचल फिर भी पवित्र है ! 

पर उस स्त्रीस्वरूप गंगा का क्या जो आजकल शादी से पहले प्यार किसी से, सेक्स किसी से और शादी किसी और से और यदि शादी के बाद भी शारीरिक सुख न मिले तो ऑनलाइन सेक्स तो है ही, आज-कल सभी महत्त्वाकांक्षी हो गए हैं | पति-पत्नी को भी प्राइवेसी चाहिए |

चुभ रहा होगा मेरा सत्य कहना, पर जो है सो है | देख रही हूँ, पढ़ रही हूँ और सुन भी रही हूँ रोज़, सोशल मीडिया के खट्टे-मीठे किस्से |

अब आप ही बताओ कि क्या बच्चे ऑनलाइन रहकर आजकल अपने भाई-बहनों से, दादा-दादी से, या परिवार के अन्य सदस्यों से घंटों बात कर सकते हैं ? मन्ने तो न लागे है ! या तो कोई बिज़नस करते हैं, या कई तरह की ऑनलाइन  डीलरशिप में पैसे कमावे हैं, स्वीगी,ज़ोमेटो करवे हैं, कुछ पढ़ने वाले पढ़ भी लेवे हैं थोड़ा-बोत, पर यही कोई ३० % |  बाकी के तो रोज़ नई गर्लफ्रेंड बनावे हैं, ४ दिन बाइक-गाडी में घुमावे हैं, बंद कमरे में ऐश करवे हैं फिर हो लिए नौ-दो-ग्यारह जी | तुम आपने रास्ते हम आपने जी | कई बार यही सोशल नेटवर्किंग आपके लिए हादसा भी बन सकती है | बात ये याद रखो कि पुरुष प्रधान समाज में अपनी ईगो को अब भूल जाओ अगर एक स्त्री के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हो तो सहने की भी हिम्मत रखनी होगी |

चाहे लड़की होवे या लड़का सब आजकल बावले सरीर के भूखे और चावें हैं ब्याह के बाद शुचित वर और कन्या ! कहाँ से लाओगे रे ! 

सोशल नेटवर्किंग में पॉर्न वीडियो देखे हौ, यौन शोषण करे हौ तो मैली गंगा में ही डुबकी लगावे की हिम्मत भी राख्यों न .......

 निवेदन यही है कि जीवन के एक कड़वे सत्य को समझिए,जानिए कि क्या खो रहे हो ??  समय भी और संस्कार भी |

           जिससे आप सभी भलीभाँति परिचित हैं | संभाल लीजिए इस जंजाल से खुद को और खुलकर बात कीजिए अपने बच्चों से,अपने अहम रिश्तों से घर में ऐसे विषय पर | शिक्षित कीजिए उनको सही-गलत को एक दोस्त की तरह समझाइए | इन्हीं कारणों से इसे शिक्षा का विषय भी बनाया गया अब | कल को जब आपके बच्चे शादी के लिए तैयार हो तो उनके मन में ये प्रश्न और संदेह न आएँ कि आज कल सब _ यौन संबंध हैं और गंगा मैली है  |

भावना 'मिलन' अरोरा 



 ग़ज़ल - इंसा तू नियामत ख़ास बना आम क्यों है ?


इंसा तू नियामत ख़ास बना आम क्यों है,
झाँक ले मन में ज़रा कि तू बदनाम क्यों है ।
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ज़िंदगी एक अनोखी जो मिली है तुझे,
पशुता से तेरी जलता ये आवाम क्यों है ।
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अहं को छोड़ दे अब ज़रा तो झुक जा,
बोई पौध है खुद से अब इंतक़ाम क्यों है ।
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तराशा जिसने तेरी माटी को किया सोना,
सोने को कर मिट्टी करता नीलाम क्यों है ।
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खुद ही है चुनता है रास्ते ग़लत सब,
कहता हाय !  मिला बुरा अंजाम क्यों है ।
——————
अपनी ग़लत सोच को तो बदल ले ज़रा,
लालच में बिकता कौड़ियों के दाम क्यों है ।
——————
जो एक बार को मिला है ये मौक़ा तुझे,
‘मिलन’ कहे राम का लेता न नाम क्यों है ।


भावना अरोड़ा ‘मिलन’
कालकाजी, नई दिल्ली

बुधवार, 13 मार्च 2019

कि और की मात्रा का स्पष्ट ज्ञान

( कि और की का प्रयोग कब और कैसे करें ??)

इस समस्या के समाधान  के लिए दो बातें याद रखें । 
(१)  आप कितनी भी जल्दबाज़ी में लिख रहे हों या बोल रहे हों किंतु आपके मस्तिष्क में यदि यह बात बैठ गई कि संज्ञा शब्दों के तुरंत बाद  (की) जैसे-  
राम की साइकिल, घर की चाबी, मम्मी की डाँट आदि । ऐसे ही  सर्वनाम शब्दों के साथ भी (की)  का प्रयोग -उसकी,इनकी, सबकी,तुम्हारी,आपकी आदि  रूप में ही होता है ।
(२) अब हम अपनी दूसरी समस्या को भी आसानी से हल कर सकते हैं । बस ये याद रखिए कि किसी भी वाक्य को बोलते या लिखते समय यदि वाक्य के मध्य में ही आपको यह आभास होता है कि अगले कथन के बिना पिछला वाक्य अर्थहीन या अधूरा है जैसे- 
१’मैंने तुमसे कहा था.........तुम यह काम जल्दी कर लेना ।’
२ ‘दोस्तों से कभी यह उम्मीद नहीं होती ........ वह हमें धोखा देंगे ।

उपरोक्त वाक्यों को पढ़कर, समझकर, बार-बार अलग-अलग वाक्य बनाकर निरंतर अभ्यास से इस दुविधा को बहुत आसानी से समाप्त कर सकते हैं ।  ज की,कि के प्रयोग की ग़लतियाँ सिर्फ़ जल्दबाज़ी के कारण ही होती है ।पठन के समय बचपन से ही कौनसी मात्रा को सामान्य स्वर के साथ और कौनसी मात्रा बलाघात ( बल देकर) पढ़ना है अगर हम इस पर कार्य करें तो यह समस्या कभी नहीं आएगी । 
यदि मेरे इस परामर्श से आपको और हमारे प्यारे बच्यों को पठन में मदद मिल सके तो आप ज़रूर इस चैनल को देखें और अपनी समस्याएँ मुझसे शेयर करें । आपकी सकारात्मक पहल आपके बच्चों के मज़बूत बनने में सहायक होगी ।
               ....धन्यवाद ☺️

‘एहसास’- मर्मस्पर्शी अनुभव

एहसास
                                            
आज पुनः आम्या और सौर्य स्कूल नहीं आए | सत्र की पहली पीटीएम में भी अनुपस्थित थे | उनके घर से कोई भी नहीं आया ये जानने को कि बच्चे पढ़ाई में कैसे हैं, उनका कौशल स्तर कैसा है ? अब या तो मैं उनके माता-पिता को फोन लगाऊँ या फिर अपनी इंचार्ज को रिपोर्ट करूँ | क्या करूँ ? क्या करूँ ? कुछ समझ नहीं आ रहा ? हैरान हूँ कि आजकल के बच्चे और उनके माता-पिता सब बदल गए हैं | सबके सब ऑनलाइन ज़िंदगी में खुश हैं | मैं तो सोचती हूँ अध्यापकों की कोई कद्र ही नहीं करता | अथक परिश्रम के बाद भी क्या हांसिल होता है थोड़ी सी इज्ज़त, वो भी कहाँ ? हुअं | क्या होगा समाज का, देश का | सर फट रहा है ज़ोर से | पर मुझे दोनों की बहुत चिंता हो रही है !! 
             (दूसरी अध्यापिका का कक्षा में प्रवेश) अरे किरण !तुम इतनी परेशान क्यों हो ? क्या हुआ कोई टेढ़ा पेरेंट आ गया क्या पीटीएम में | मेरे तो सारे पैरेंट्स आकर भी चले गए | बहुत देर से तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रही थी | चलो जल्दी अब बहुत भूख लगी है, खाना खाते हैं | अरे ! उठो भी, इतना परेशान मत हो यहाँ तो ये सब लगा ही रहता है | मैं अनमनी सी सारा सामान अलमारी में रखकर दिशा के साथ स्टाफ रूम की ओर चल दी | बार-बार एक ही सवाल मुझे परेशान कर रहा था,स्कूल का समय खत्म हुआ घर के कामों की  व्यस्तता के पश्चात बिस्तर पर लेटते ही कुछ कौंध रहा था बिजली का सा |मैं  एकदम रात को उठकर बैठ गई | कल मैं सबसे पहले सौर्य के पैरेंट्स को फोन करूँगी नहीं तो मुझे चैन नहीं आएगा | इसी कशमकश में रात कब बीती मुझे पता ही नहीं चला |
        फिर उसी तूफानी भागदौड़ के साथ मैं जोश में बढ़ चलीऔर तुरंत रिशेप्सन पर पहुँचकर मैंने आम्या और सौर्य के माता-पिता को फोन मिला दिया | काफ़ी देर तक घंटी बजने के बाद किसी ने फोन उठाया कहा कि कल उनके पिताजी स्कूल आएंगे और आपसे बात करेंगे | अभी कुछ और मैं कहती उससे पहले ही फोन कट गया | मैं स्तब्ध सी अपनी कक्षा की ओर बढ़ चली और अपने रोज़ के कामों में व्यस्त हो गई | जिन अध्यापिकाओं ने आम्या और सौर्य को पहले पढ़ाया था उनसे भी मैंने बातचीत की तो पता चला कि वे पहले कभी अनुपस्थित नहीं होते थे और जैसा उन्होने बताया कि आम्या थोड़ा चंचल स्वभाव कि है और सौर्य थोड़ा समझदार |
        मैंने पिछली जानकारी को सुनकर सोचा कि आम्या और सौर्य तो कक्षा में ज़्यादा अनुपस्थित रहते हैं | मुझे बड़ी हैरानी हुई ये सोचकर ! इस प्रकार कल उनके पिताजी से बात करने के लिए पूरी भूमिका मैंने तैयार करली | मुझे आज सुखद महसूस हो रहा था कि कल मेरी कक्षा के दोनों बच्चों के अनुपस्थित रहने और पीटीएम में न आने का कारण मुझे पता लगेगा | मैं निश्चिंत होकर सोई | सुबह जब स्कूल आई तो उनके पिताजी रिशेप्सन पर बैठे थे | उन्हें ५ से १० मिनट के बाद ऊपर मेरी कक्षा में भेजा गया | बड़ी बेसब्री से मैं भी उनका इंतज़ार कर रही थी |
    नमस्कार के बाद बात शुरू ही करती कि उससे पहले ही उनकी आँखें भर आईं | अचानक उन्हें इस स्थिति में देख मैंने कुर्सी आगे की उन्हें बैठाया पानी मंगवाया | कुछ क्षण बाद जैसे ही बोलने को हुई एकदम से उनके मुँह से निकला कि इन बच्चों की माँ नहीं रहीं | मैं जानता हूँ आपके मन में कई सवाल हैं, बच्चों के कार्य और व्यवहार को लेकर | जून के महीने में ही उनका स्वर्गवास हुआ, तभी किसी को भी स्कूल में इस बारे में जानकारी नहीं थी | अभी थोड़ा संभल रहे हैं, कई बार मेड नहीं आती तो उनका टिफिन तैयार करने में मुझे वक़्त लग जाता है | इसी वजह से कई बार वह स्कूल भी नहीं आ पाते |
यह सब सुनकर मेरे पैरों के नीचे से मानो ज़मीन निकल गई |आँखों के आगे अंधेरा सा छा गया, मैं हतप्रभ सी एकटक सब सुनती रही मानो मस्तिष्क में बर्फ जम गई हो | वह जैसे ही कुर्सी से उठ खड़े हुए तो मेरी आँखें ऐसे छलछलाईं मानो गहरे समुंदर के भीतर आए तूफ़ान ने छोटा रूप ले लिया और बह चला अपने वेग को संभाल | 
                    माँ को खोने के एहसास मात्र से ही रूह कांप रही थी | आँखों में दोनों का खिलखिलाता मासूम सा चेहरा,एक लंबी उदासी और एक दृण संकल्प की भावना थी | मैंने खुद को संभाला और एक गहरी आश्वासन भरी सांस से खा आपके दोनों बच्चे बहुत प्यारे हैं, अच्छा करते हैं और भी अच्छा करेंगे खुद पर और ऊपरवाले पर यकीन रखिए | उनको मैंने ढांढस तो बंधाई हर वक़्त मैं उन बच्चों के बहुत करीब हूँ किन्तु ये एहसास जीवन भर के लिए मुझे बहुत कुछ सिखा गया |      
                                                        भावना ‘मिलन’