शनिवार, 12 जून 2021

विषय ------ पर्यावरण सुरक्षा विधा- ( लघुकथा - संतान )

  विधा- ( लघुकथा - संतान )

अरे पुतवा ! तू अभी तक यहीं खाट पर बैठा है ।

 गाँव की सारी पंचायत,छोटे-बड़े  सभी पौध लगाने के लिए जमा हो गए हैं । ‘सब तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं चल-चल जल्दी उठ ।’

‘सरपंच जी ने मुझे भेजा है तुझे बुलाने को।’ - मक्खन दादा ने कहा ।

पुतवा कुछ देर ख़ामोश रहा मानो डूबते सूरज-सी उदासी उसके अंतर में समा गई हो ।

‘मैं क्या करूँगा आकर ! आपको तो पता है न कि मेरा जवान बेटा नहीं रहा । शहर बस गया था हमारे लिए चार पैसे कमाने को, पर अकेला था, उसे वक्त पर सही इलाज न मिल सका ! लोग कालाबाज़ारी करते रहे और बिना आक्सीजन सिलेंडर के ही।

मुझे नहीं लगाना कोई पौध-वौध मेरा तो संसार ही उजड़ गया.......(पुतवा का गला रुंध गया वह आगे कुछ न कह सका ) 

‘देख पुतवा,हम तेरा दर्द समझते हैं । हम तेरा बेटा तो वापिस नहीं का सकते, पर क्या तू चाहेगा कि महामारी ने जिन बेक़सूर मासूमों को को दुष्ट लोगों के कुकर्मों की वजह से लपेट लिया है । वो कहावत हैं न -‘आटे के साथ घुन भी पिस जाता है ।’ हम एक पौध लगाकर अपने पर्यावरण की रक्षा करेंगे तो प्रकृति का क्रोध कम कर सकेंगे, शायद ये महामारी सिमट जाए ।

 अच्छी कोशिशें कभी ज़ाया नहीं होतीं ।  अगर तू अपने बेटे के नाम से एक पौध लगाएगा तो ये समझना कि तूने कितनों को जीवन दिया है । 

यही सच्ची श्रद्धानजलि  होगी तेरी अपने बेटे को ।’ मक्खन दादा ने पुतवा काँधे पर हाथ रखकर कहा ।

पुतवा- ‘ हाँ ! दादा ( गंभीर सोच के साथ उठता है । ) 

वो एक पौध नहीं मेरी वो संतान होगा  जो सभी को साँसें देगा बिना भेदभाव के। 

चलो चलता हूँ ।’

भावना अरोड़ा ‘मिलन’

कालकाजी,नई दिल्ली

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